Monday, February 11, 2013


कुछ वीरानी सी है यह शाम,
आज शब्दों की कुछ कमी सी है,
रोज की तरह आज भी सूरज डूबते हुए लालिम ही था,
बदला कुछ भी नहीं,
पर कुछ भावनाएँ बदल चुकी हैं,
मेरी नहीं,,
तुम जानती हो किसकी,,
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वैसे तो तुम कभी थी भी नहीं मेरी,
किन्तु एक भाव था तुम्हें अपना माना था कभी,
लरज़िश भरे हाथों से कुछ बातों का पुलिंदा सौंपा था कभी,
आज उन बातों का कुछ अर्थ नहीं,
कुछ बातें बेवजह की थी,
आज उनका कुछ अर्थ नहीं,
तुम्हारे लिए,,,
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हसरतों के रास्ते भी बड़े एकाकी होते हैं,
कोई राज़ी नहीं होता साथ देने को,
साथ रह जाती हैं बस कुछ यादें,
वह भी बिछड़ जाएँगी,
कुछ रास्तों से कटती पगडंडियों की तरह,,,,
कुछ तुम्हारी तरह,
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कुछ भी तो नहीं है इस मकान में,
दरीचे और दरवाजों के सिवाय,

मेज पर बिखरी पड़ी किताबें,
अलमारी में बेतरतीब पड़े कपड़े,
दीवार पर बीते साल का कैलेंडर

तुम होती तो शायद सजाया होता करीने से,,,
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एक दिन मुरझाएगा,
मेरे बगीचे में लगा वो गुलाब का फूल,
उस पर मंडराता भंवरा भी,
रंजीदा हो चला जाएगा,
बस उस दिन के पहले,
तुम एक बार फिर मिलना,
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एक आखिरी तोहफा,
तुम्हारे नाम से लिखे कुछ पन्ने,
'कुछ बातें अनकही,'
अब मेरे किसी काम की नहीं।
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Tuesday, January 8, 2013

ताजा खबर यह है कि भारत में नियुक्त पाकिस्तान के उच्च आयुक्त को विदेश मंत्रालय में आज दोपहर बुलाया गया है।
आशा करता हूँ कि खुर्शीदजी ऐसा बोले " समझा लो अपने सैनिकों को कि  कश्मीर हमारा है, पंगे ना लें।"

मुझे पता है मैंने बहुत बड़ी अपेक्षा रखली है,
होने क्या वाला है यह आपको भी पता है और मुझे भी पता है।
बड़ा शानदार सा भोज होगा, मस्त हिंदुस्तानी मुर्गे खिलाये जाएंगे छोटे भाइयों को,
भारतीय हाईकमान बोलेगा कि "भाई हम आपकी सेना द्वारा हमले का विरोध करते हैं, इतने इतने बार ceasefire का उल्लंघन हुआ है, हमारे इतने इतने सैनिक शहीद होगये हैं, हम अमन की आशा रखते हैं।"
उधर से जवाब आयेगा कि "भाई पहले सबूत तो बताओ, फिर देखते हैं।"
बढ़िया दो चार फोटू खिचायेंगे, एक साइड भारत का झंडा दूसरी साइड पाकिस्तान का झंडा।
मस्त हँसते खेलते दोनों अपने अपने घर जायेंगे, और मजाक उड़ाएंगे।
भारतीय हाईकमान हंसेगा कि चलो भारतीय जनता और सैनिकों को 'टोपी' पहना दी,
और उधर पाकिस्तानी आयुक्त हंसेगा कि चलो हिन्दुस्तानियों को 'टोपी' पहना दी।
बदलेगा कुछ नहीं जनाब,
इधर हमारा खून खौलता रहेगा, उधर सीमा पर जवानों का।
मीडिया भी दो चार दिन चिल्लाता रहेगा, इतने में कोई न कोई अपने कुत्सित विचार लेकर आ जायेगा,
अपन उस पर केन्द्रित हो जाएंगे।
हम ही चुनते आ रहे हैं अपने हाईकमान को 1947 से, हम लोग तो यहाँ आराम से बैठे हैं।
हमारी गलतियों की सजा बेचारे सैनिक भोग रहे हैं।
और राजनेताओं की बात करना तो व्यर्थ ही है, इस देश में आज अगर कोई सानंद है तो बस यही लोग हैं।

Thursday, January 3, 2013

क्या खोया क्या पाया

नया साल आगया हैं, एक नज़रिए से तो calender के अलावा कुछ भी नहीं बदला है। लेकिन calender बदलते हुए यह मैं हर साल की तरह चिंतन करने बैठ गया।श्री अटल बिहारीजी की एक कविता याद आयी-

" क्या खोया क्या पाया जग मैं,
मिलते और बिछड़ते पग में,

मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि चला गया पग पग में,

एक दृष्टि बीती पर डालें,
यादों की पोटली टटोलें,

अपने ही मन से कुछ बोलें,
अपने ही मन से कुछ बोलें।"

कविता की एक बहुत बड़ी विशेषता है, कवि और पाठक के बीच अनूठे तार बांध देती है, जैसे दोनों दिलों की धड़कने एक दिल में समा जाती हैं। जो दो व्यक्तियों की भावनाओं को एक कर दे वही कविता होती है।

मेरे लिए हर साल की पहली तारीख मनन करने का ही दिन होता है, शायद इस दिन को बनाया ही इसलिए गया होगा, ताकि क्या खोया और क्या पाया बस इन बातों को बटोर ले, और सम्पूर्णता की और बड़ें। बहुत पहले कुछ लिखा था मैंने --

"मानव  ने  जन्म  लिया ,
बचपन  की  चपलता ,
और  यौवन  की  उच्चश्रन्खला,
और  फिर  शांत  बुढ़ापा ,
फिर  जाते  जाते  मानव  ने  खुद  से  पूछा ,
"जिंदगी  सिखाती  है  , कितना  सीखा ?",
उत्तर  मिला - थोडा बहुत ,
और  पुनः  प्रारंभ  हुई
आदर्श  जीवन  के  लिए  यात्रा ...."

कर्म की परिनिष्पति ज्ञान के उदय से होती है, और ज्ञान का उदय शनै: शनै: होता है, अनवरत अभ्यास और गलतियों से सीख लेकर ही कोई परिपूर्ण होता है। यह दौड़ केवल एक आदर्श जीवन के लिए ही तो है। मैं भी सीख रहा हूँ और दौड़ रहा हूँ। तभी तो calendar  बदलना जरूरी है। आत्मविश्लेषण ही प्रयोजन है इस दिन का।



Monday, December 17, 2012

Thermodynamics

कुछ यादें बेवजह दिमाग की entropy बढाती  हैं। लाख कोशिश कर लीजिये दिमाग के process को isentropic नहीं बना सकते।अब कैसे बनायेंगे भला न तो दिमाग internally reversible होता है और न ही reversible adiabatic. कभी कभी सोचता हूँ ज़िन्दगी quasi-static process की तरह होती तो कितना बढ़िया होता। कम से कम ज़िन्दगी का कोई एक हिस्सा तो equilibrium में रहता। Equilibrium तो बहुत दूर की बात है जब दिमाग में ख्याल light की velocity से इधर उधर दौड़ते कूदते रहते हैं। काश इन ख्यालों का mean free path थोड़ा कम कर पाता तो शायद थोड़ा बहुत सुकून मिलता।
काश Albert Einstein Time-Space का कोई बढ़िया सा relation दे जाते तो आज जो ये फालतू की बकर यहाँ अकेले बैठकर कर रहा हूँ, electronics की lab में अपने doctor's  group के साथ करता तो बड़ा आनंद भी आता और ये बेवजह की बात मेरे भेजे की randomness भी नहीं बढाती। यादें सच में कभी कभी बड़ा परेशान कर देती हैं। यही कुछ यादें पुरानी आज P K  Nag  की किताब के साथ आगयी थी। तभी आज thermodynamics की भाषा में बकर कर दी। झेल लेना।। आदत ही है  मेरी झिलाने की।

Wednesday, November 7, 2012

एकाकीपन की बातें

"एकाकीपन की बातें "

तन्हा होना भी कभी कभी बड़ा सुखद होता है। 
खिड़की के किनारे बैठ , 
वह सब कुछ सोच सकते जो हम चाहते हैं,
वह पल जो हमें ख़ुशी देते हैं,
वह बातें जिन्हें याद करके चेहरे पर मुस्कान आ जाए,
हम अपनी मर्जी से चुन सकते हैं वो चेहरे जिन्हें हम याद रखना चाहते हैं ,
उन चेहरों से जुडी यादें और बातें,
उन बातों को भी हम अपनी मर्जी से आने और जाने देते हैं,

सहसा ही मेज पर पड़ी खुली पड़ी एक डायरी के उड़ते हुए पन्ने,
खींच कर ले जाती है कुछ ऐसी यादों के घोंसलों में,
आँखों के सामने उड़ने लगे कुछ सूखे पत्ते,
जो उन घोंसलों को बनाते समय,
गिरे होंगे जमीं पर,
कितना अद्भुद होता है ये मन,
एक छोटी सी चीज से ना जाने कैसे जोड़ लेता है यादें।

समय कभी स्थिर नहीं रहता,
फिर कभी दोहराये नहीं जाएँगे वह पल,
जहाँ अचानक ही खींच ले गया मेरा मन,
अब कभी फिर से यह  जगह नहीं होगी,
उदासी से घिर जाती है वही सुखद यादें,
जिन्हें खुद ही मैंने चुना था,

यही एकाकीपन काटने लगता है, जो कभी सुखद था,
सुखद और दुखद बातों में यही एक फर्क है
सुखद बातें मर्जी से आ या जा सकती हैं 
लेकिन दुखद बातें जब आ जाती है वह हमारी मर्जी से नहीं जाती हैं।

कुछ बातें कभी हमारा साथ नहीं छोडती हैं,
हम संघर्ष करते हैं पर फिर भी हमें समेट लेती हैं कुछ बातें 
जैसे सूखी मिटटी सोख लेती है पानी को।

समय तो चलता रहता है,
कुछ भी चिरस्थायी नहीं रहता,
शेष रहता है एकाकीपन, और उसकी बातें।

-दीपेश भावसार 



Monday, October 29, 2012

पूर्णिमा की रात शायद सबसे खूबसूरत रात होती है,
ईश्वर ने रात बेशक सोने के लिए ही बनाई है, पर कभी रात में जागने का आनंद कुछ और ही होता है।
रात का शांत वातावरण, दिनभर की भागदौड़ के बाद बड़ा सुकून देता है।
ऐसी ही एक रात ..........

चाँदनी रात में,
दूध सी नहाई कायनात सारी,
भरा है अम्बर का आनन ,
छोटे छोटे तारों से,
सजा है आसमान,
कि जैसे दुल्हन कोई,
खेल रहे हैं बादल,
चाँद संग अठखेलियाँ,
दूर क्षितिज में एक पर्वत,
बड़ा भोला सा लगता है,
जैसे माँ की गोद में,
बच्चा कोई सोया हो,

नदी का धीमा धीमा बहाव,
कर रहा  है भंग रात की  नीरवता,
पेड़ों के झुरमुट,
गा रहे हैं कोई राग,
हवाओं के चुम्बन से,

हवाएं जब खेलती हैं,
सूखे पत्तों से,
किसी के आने का सा भ्रम हो जाता है,
दूर गाँव से आती घरों की रोशनी,
जैसे जुगनुओं का झुण्ड कोई।

Wednesday, October 3, 2012

कल 2 अक्टूबर थी, 'बापू' का जन्मदिन। facebook और twitter  पर लगभग सेंकडों पोस्ट्स देखी मैने। उनमे तीन तरह की पोस्ट्स थी।
1.) गांधीजी को जन्मदिन की बधाइयाँ।
2.) लाल बहादुर शास्त्री जी को बधाइयाँ।
3.) और सबसे ज्यादा जो देखने को मिली वह ये की नाथूराम गोडसे ने बड़ा पुण्य किया गांधीजी की हत्या करके।
         गांधीजी को जन्मदिन की बधाइयाँ देने की तो नैतिक जिम्मेदारी बनती है हर भारतीय की, बस वही पूरी कर रहे थे कई लोग। अहिंसा की बातें, आजादी की लड़ाई, सत्याग्रह, दांडी  यात्रा आदि बहुत कुछ। ऐसा लग रहा था जैसे कि इतिहास की किताब facebook पर छप गयी हो। गांधीजी के साथ साथ मुन्नाभाई भी दिखाई पड़े जिन्होंने करीब 6 साल पहले गांधीगिरी का पाठ एक नए अंदाज में सिखाया था। वहीँ न्यूज़ चैनल खोला तो फलां नेता राजघाट पर गांधीजी को "happy birthday " बोलने ( पुष्पांजलि देने ) आये। अखबार खोला तो विभिन्न सज्जनों ने गांधीजी को याद किया हुआ था। खैर सभी  लोगों ने अपना दायित्व बहुत अच्छे से निभाया।
       दूसरी कुछ पोस्ट्स थी शास्त्रीजी की। शास्त्रीजी निस्संदेह अदभुद प्रतिभा के धनी थे। लेकिन उनके जन्मदिन पर उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। शायद बापू के जन्मदिन पर जन्म लेने का ये सौभाग्य ही इस उपेक्षा का कारण था। किन्तु विभिन्न पोस्ट्स पर शास्त्रीजी की उपेक्षा का रोना केवल इसीलिए लग रहा था क्यूंकि  आजकल गाँधी विरोधी विचारधारा चलन में है।
      सबसे ज्यादा जो पोस्ट्स थी वो केवल यही कहना चाह रही थी कि गांधीजी का जन्म लेना देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य था। नाथूराम गोडसे अचानक से भगवान् बनकर पूरी इन्टरनेट की दुनिया पर  छा गया। उनके हिसाब से गांधीजी की हत्या बहुत पुण्य का काम था। नाथूराम ने गांधीजी की हत्या जिस भी कारण  से की हो, पर क्या यह सही था? मैं कतई गांधीवादी नहीं हूँ, किन्तु गांधीजी की जो अच्छी बाते थी वोह हमेशा ही प्रेरित करती रही हैं। कल यह पोस्ट्स पदके थोडा दुःख हुआ इसलिए नहीं की गांधीजी के बारे में बेहद नकारात्मक भावनाओं का चलन है। दुःख  इसलिए हुआ की हम लोग कभी खुद से नहीं सोचते हैं क्या सही है और क्या गलत है? माइक पर चिल्ला चिल्ला के कोई नेता अगर सपने दिखा देता हैं कि भारत निर्माण होगा, देश प्रगति करेगा तो हम बड़ी ख़ुशी के साथ यह मान लेते हैं। आजकल facebook  पर कोई कोई भाई  नाथूराम गोडसे को भगवन और गांधीजी को हैवान बनाके पोस्ट करदेता है तो हम बड़े शौक से उसे शेयर कर देते हैं। रुक कर यह नहीं सोचते की हमको 60 वर्षों से केवल गुमराह किया जारहा है। क्या किसी व्यक्ति के ज्ञान का सदुपयोग हम नहीं कर सकते हैं? मैं नहीं कहता कि किसी महापुरुष या किसी व्यक्ति का अनुसरण किया जाना आवश्यक है। लेकिन क्या ज्ञान अगर अच्छा है तो उसका पालन गलत कैसे हो सकता है?
                   
                           बचपन से हर भारतीय को बापू के पाठ पढाए गए हैं। सरलमति बच्चों  के मानस पटल पर यह अहिंसा का पाठ अंकित कर दिया जाता है।हालाँकि जब तक यह बच्चे थोड़े समझदार होते हैं उनके दिमाग में, रटाई गयी गांधीजी की बातें धूमिल हो चुकी होती हैं। मुझे याद है आठवी कक्षा में हिंदी और इंग्लिश भाषा में गाँधीजी की जीवनी और उनकी शिक्षाएं पढना एक प्रकार की विवशता ज्यादा हुआ करती थी।  शायद यही एक कारण है असामाजिकता का। जो बीज जिस प्रकार से रोपित किया जाना था वह किया नहीं गया। 
              Facebook और Twitter की दुनिया में आडम्बर के अलावा कुछ नहीं दिखता  है। हम किसी को भी भगवान् बना देते हैं किसी को भी हैवान। एक गाली देना शुरू करता है, 100 लोग उस status  को like  और शेयर कर देते हैं। मूलवस्तु कहीं दिखाई नहीं देती है।



"ज्ञान के अभाव में ही अज्ञान आ जाता है | इसी का नतीजा है कि आदमी जो नहीं जानता, समझाता; उसी को बढ़ा-चढ़ाकर बताना चाहता है | "

- महात्मा गाँधी