नया साल आगया हैं, एक नज़रिए से तो calender के अलावा कुछ भी नहीं बदला है। लेकिन calender बदलते हुए यह मैं हर साल की तरह चिंतन करने बैठ गया।श्री अटल बिहारीजी की एक कविता याद आयी-
" क्या खोया क्या पाया जग मैं,
मिलते और बिछड़ते पग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि चला गया पग पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें,
यादों की पोटली टटोलें,
अपने ही मन से कुछ बोलें,
अपने ही मन से कुछ बोलें।"
कविता की एक बहुत बड़ी विशेषता है, कवि और पाठक के बीच अनूठे तार बांध देती है, जैसे दोनों दिलों की धड़कने एक दिल में समा जाती हैं। जो दो व्यक्तियों की भावनाओं को एक कर दे वही कविता होती है।
मेरे लिए हर साल की पहली तारीख मनन करने का ही दिन होता है, शायद इस दिन को बनाया ही इसलिए गया होगा, ताकि क्या खोया और क्या पाया बस इन बातों को बटोर ले, और सम्पूर्णता की और बड़ें। बहुत पहले कुछ लिखा था मैंने --
"मानव ने जन्म लिया ,
बचपन की चपलता ,
और यौवन की उच्चश्रन्खला,
और फिर शांत बुढ़ापा ,
फिर जाते जाते मानव ने खुद से पूछा ,
"जिंदगी सिखाती है , कितना सीखा ?",
उत्तर मिला - थोडा बहुत ,
और पुनः प्रारंभ हुई
आदर्श जीवन के लिए यात्रा ...."
कर्म की परिनिष्पति ज्ञान के उदय से होती है, और ज्ञान का उदय शनै: शनै: होता है, अनवरत अभ्यास और गलतियों से सीख लेकर ही कोई परिपूर्ण होता है। यह दौड़ केवल एक आदर्श जीवन के लिए ही तो है। मैं भी सीख रहा हूँ और दौड़ रहा हूँ। तभी तो calendar बदलना जरूरी है। आत्मविश्लेषण ही प्रयोजन है इस दिन का।
" क्या खोया क्या पाया जग मैं,
मिलते और बिछड़ते पग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि चला गया पग पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें,
यादों की पोटली टटोलें,
अपने ही मन से कुछ बोलें,
अपने ही मन से कुछ बोलें।"
कविता की एक बहुत बड़ी विशेषता है, कवि और पाठक के बीच अनूठे तार बांध देती है, जैसे दोनों दिलों की धड़कने एक दिल में समा जाती हैं। जो दो व्यक्तियों की भावनाओं को एक कर दे वही कविता होती है।
मेरे लिए हर साल की पहली तारीख मनन करने का ही दिन होता है, शायद इस दिन को बनाया ही इसलिए गया होगा, ताकि क्या खोया और क्या पाया बस इन बातों को बटोर ले, और सम्पूर्णता की और बड़ें। बहुत पहले कुछ लिखा था मैंने --
"मानव ने जन्म लिया ,
बचपन की चपलता ,
और यौवन की उच्चश्रन्खला,
और फिर शांत बुढ़ापा ,
फिर जाते जाते मानव ने खुद से पूछा ,
"जिंदगी सिखाती है , कितना सीखा ?",
उत्तर मिला - थोडा बहुत ,
और पुनः प्रारंभ हुई
आदर्श जीवन के लिए यात्रा ...."
कर्म की परिनिष्पति ज्ञान के उदय से होती है, और ज्ञान का उदय शनै: शनै: होता है, अनवरत अभ्यास और गलतियों से सीख लेकर ही कोई परिपूर्ण होता है। यह दौड़ केवल एक आदर्श जीवन के लिए ही तो है। मैं भी सीख रहा हूँ और दौड़ रहा हूँ। तभी तो calendar बदलना जरूरी है। आत्मविश्लेषण ही प्रयोजन है इस दिन का।
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