Monday, October 29, 2012

पूर्णिमा की रात शायद सबसे खूबसूरत रात होती है,
ईश्वर ने रात बेशक सोने के लिए ही बनाई है, पर कभी रात में जागने का आनंद कुछ और ही होता है।
रात का शांत वातावरण, दिनभर की भागदौड़ के बाद बड़ा सुकून देता है।
ऐसी ही एक रात ..........

चाँदनी रात में,
दूध सी नहाई कायनात सारी,
भरा है अम्बर का आनन ,
छोटे छोटे तारों से,
सजा है आसमान,
कि जैसे दुल्हन कोई,
खेल रहे हैं बादल,
चाँद संग अठखेलियाँ,
दूर क्षितिज में एक पर्वत,
बड़ा भोला सा लगता है,
जैसे माँ की गोद में,
बच्चा कोई सोया हो,

नदी का धीमा धीमा बहाव,
कर रहा  है भंग रात की  नीरवता,
पेड़ों के झुरमुट,
गा रहे हैं कोई राग,
हवाओं के चुम्बन से,

हवाएं जब खेलती हैं,
सूखे पत्तों से,
किसी के आने का सा भ्रम हो जाता है,
दूर गाँव से आती घरों की रोशनी,
जैसे जुगनुओं का झुण्ड कोई।

No comments:

Post a Comment