कुछ यादें बेवजह दिमाग की entropy बढाती हैं। लाख कोशिश कर लीजिये दिमाग के process को isentropic नहीं बना सकते।अब कैसे बनायेंगे भला न तो दिमाग internally reversible होता है और न ही reversible adiabatic. कभी कभी सोचता हूँ ज़िन्दगी quasi-static process की तरह होती तो कितना बढ़िया होता। कम से कम ज़िन्दगी का कोई एक हिस्सा तो equilibrium में रहता। Equilibrium तो बहुत दूर की बात है जब दिमाग में ख्याल light की velocity से इधर उधर दौड़ते कूदते रहते हैं। काश इन ख्यालों का mean free path थोड़ा कम कर पाता तो शायद थोड़ा बहुत सुकून मिलता।
काश Albert Einstein Time-Space का कोई बढ़िया सा relation दे जाते तो आज जो ये फालतू की बकर यहाँ अकेले बैठकर कर रहा हूँ, electronics की lab में अपने doctor's group के साथ करता तो बड़ा आनंद भी आता और ये बेवजह की बात मेरे भेजे की randomness भी नहीं बढाती। यादें सच में कभी कभी बड़ा परेशान कर देती हैं। यही कुछ यादें पुरानी आज P K Nag की किताब के साथ आगयी थी। तभी आज thermodynamics की भाषा में बकर कर दी। झेल लेना।। आदत ही है मेरी झिलाने की।
काश Albert Einstein Time-Space का कोई बढ़िया सा relation दे जाते तो आज जो ये फालतू की बकर यहाँ अकेले बैठकर कर रहा हूँ, electronics की lab में अपने doctor's group के साथ करता तो बड़ा आनंद भी आता और ये बेवजह की बात मेरे भेजे की randomness भी नहीं बढाती। यादें सच में कभी कभी बड़ा परेशान कर देती हैं। यही कुछ यादें पुरानी आज P K Nag की किताब के साथ आगयी थी। तभी आज thermodynamics की भाषा में बकर कर दी। झेल लेना।। आदत ही है मेरी झिलाने की।
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