कल 2 अक्टूबर थी, 'बापू' का जन्मदिन। facebook और twitter पर लगभग सेंकडों पोस्ट्स देखी मैने। उनमे तीन तरह की पोस्ट्स थी।
1.) गांधीजी को जन्मदिन की बधाइयाँ।
2.) लाल बहादुर शास्त्री जी को बधाइयाँ।
3.) और सबसे ज्यादा जो देखने को मिली वह ये की नाथूराम गोडसे ने बड़ा पुण्य किया गांधीजी की हत्या करके।
गांधीजी को जन्मदिन की बधाइयाँ देने की तो नैतिक जिम्मेदारी बनती है हर भारतीय की, बस वही पूरी कर रहे थे कई लोग। अहिंसा की बातें, आजादी की लड़ाई, सत्याग्रह, दांडी यात्रा आदि बहुत कुछ। ऐसा लग रहा था जैसे कि इतिहास की किताब facebook पर छप गयी हो। गांधीजी के साथ साथ मुन्नाभाई भी दिखाई पड़े जिन्होंने करीब 6 साल पहले गांधीगिरी का पाठ एक नए अंदाज में सिखाया था। वहीँ न्यूज़ चैनल खोला तो फलां नेता राजघाट पर गांधीजी को "happy birthday " बोलने ( पुष्पांजलि देने ) आये। अखबार खोला तो विभिन्न सज्जनों ने गांधीजी को याद किया हुआ था। खैर सभी लोगों ने अपना दायित्व बहुत अच्छे से निभाया।
दूसरी कुछ पोस्ट्स थी शास्त्रीजी की। शास्त्रीजी निस्संदेह अदभुद प्रतिभा के धनी थे। लेकिन उनके जन्मदिन पर उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। शायद बापू के जन्मदिन पर जन्म लेने का ये सौभाग्य ही इस उपेक्षा का कारण था। किन्तु विभिन्न पोस्ट्स पर शास्त्रीजी की उपेक्षा का रोना केवल इसीलिए लग रहा था क्यूंकि आजकल गाँधी विरोधी विचारधारा चलन में है।
सबसे ज्यादा जो पोस्ट्स थी वो केवल यही कहना चाह रही थी कि गांधीजी का जन्म लेना देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य था। नाथूराम गोडसे अचानक से भगवान् बनकर पूरी इन्टरनेट की दुनिया पर छा गया। उनके हिसाब से गांधीजी की हत्या बहुत पुण्य का काम था। नाथूराम ने गांधीजी की हत्या जिस भी कारण से की हो, पर क्या यह सही था? मैं कतई गांधीवादी नहीं हूँ, किन्तु गांधीजी की जो अच्छी बाते थी वोह हमेशा ही प्रेरित करती रही हैं। कल यह पोस्ट्स पदके थोडा दुःख हुआ इसलिए नहीं की गांधीजी के बारे में बेहद नकारात्मक भावनाओं का चलन है। दुःख इसलिए हुआ की हम लोग कभी खुद से नहीं सोचते हैं क्या सही है और क्या गलत है? माइक पर चिल्ला चिल्ला के कोई नेता अगर सपने दिखा देता हैं कि भारत निर्माण होगा, देश प्रगति करेगा तो हम बड़ी ख़ुशी के साथ यह मान लेते हैं। आजकल facebook पर कोई कोई भाई नाथूराम गोडसे को भगवन और गांधीजी को हैवान बनाके पोस्ट करदेता है तो हम बड़े शौक से उसे शेयर कर देते हैं। रुक कर यह नहीं सोचते की हमको 60 वर्षों से केवल गुमराह किया जारहा है। क्या किसी व्यक्ति के ज्ञान का सदुपयोग हम नहीं कर सकते हैं? मैं नहीं कहता कि किसी महापुरुष या किसी व्यक्ति का अनुसरण किया जाना आवश्यक है। लेकिन क्या ज्ञान अगर अच्छा है तो उसका पालन गलत कैसे हो सकता है?
बचपन से हर भारतीय को बापू के पाठ पढाए गए हैं। सरलमति बच्चों के मानस पटल पर यह अहिंसा का पाठ अंकित कर दिया जाता है।हालाँकि जब तक यह बच्चे थोड़े समझदार होते हैं उनके दिमाग में, रटाई गयी गांधीजी की बातें धूमिल हो चुकी होती हैं। मुझे याद है आठवी कक्षा में हिंदी और इंग्लिश भाषा में गाँधीजी की जीवनी और उनकी शिक्षाएं पढना एक प्रकार की विवशता ज्यादा हुआ करती थी। शायद यही एक कारण है असामाजिकता का। जो बीज जिस प्रकार से रोपित किया जाना था वह किया नहीं गया।
Facebook और Twitter की दुनिया में आडम्बर के अलावा कुछ नहीं दिखता है। हम किसी को भी भगवान् बना देते हैं किसी को भी हैवान। एक गाली देना शुरू करता है, 100 लोग उस status को like और शेयर कर देते हैं। मूलवस्तु कहीं दिखाई नहीं देती है।
"ज्ञान के अभाव में ही अज्ञान आ जाता है | इसी का नतीजा है कि आदमी जो नहीं जानता, समझाता; उसी को बढ़ा-चढ़ाकर बताना चाहता है | "
- महात्मा गाँधी