Tuesday, January 8, 2013

ताजा खबर यह है कि भारत में नियुक्त पाकिस्तान के उच्च आयुक्त को विदेश मंत्रालय में आज दोपहर बुलाया गया है।
आशा करता हूँ कि खुर्शीदजी ऐसा बोले " समझा लो अपने सैनिकों को कि  कश्मीर हमारा है, पंगे ना लें।"

मुझे पता है मैंने बहुत बड़ी अपेक्षा रखली है,
होने क्या वाला है यह आपको भी पता है और मुझे भी पता है।
बड़ा शानदार सा भोज होगा, मस्त हिंदुस्तानी मुर्गे खिलाये जाएंगे छोटे भाइयों को,
भारतीय हाईकमान बोलेगा कि "भाई हम आपकी सेना द्वारा हमले का विरोध करते हैं, इतने इतने बार ceasefire का उल्लंघन हुआ है, हमारे इतने इतने सैनिक शहीद होगये हैं, हम अमन की आशा रखते हैं।"
उधर से जवाब आयेगा कि "भाई पहले सबूत तो बताओ, फिर देखते हैं।"
बढ़िया दो चार फोटू खिचायेंगे, एक साइड भारत का झंडा दूसरी साइड पाकिस्तान का झंडा।
मस्त हँसते खेलते दोनों अपने अपने घर जायेंगे, और मजाक उड़ाएंगे।
भारतीय हाईकमान हंसेगा कि चलो भारतीय जनता और सैनिकों को 'टोपी' पहना दी,
और उधर पाकिस्तानी आयुक्त हंसेगा कि चलो हिन्दुस्तानियों को 'टोपी' पहना दी।
बदलेगा कुछ नहीं जनाब,
इधर हमारा खून खौलता रहेगा, उधर सीमा पर जवानों का।
मीडिया भी दो चार दिन चिल्लाता रहेगा, इतने में कोई न कोई अपने कुत्सित विचार लेकर आ जायेगा,
अपन उस पर केन्द्रित हो जाएंगे।
हम ही चुनते आ रहे हैं अपने हाईकमान को 1947 से, हम लोग तो यहाँ आराम से बैठे हैं।
हमारी गलतियों की सजा बेचारे सैनिक भोग रहे हैं।
और राजनेताओं की बात करना तो व्यर्थ ही है, इस देश में आज अगर कोई सानंद है तो बस यही लोग हैं।

Thursday, January 3, 2013

क्या खोया क्या पाया

नया साल आगया हैं, एक नज़रिए से तो calender के अलावा कुछ भी नहीं बदला है। लेकिन calender बदलते हुए यह मैं हर साल की तरह चिंतन करने बैठ गया।श्री अटल बिहारीजी की एक कविता याद आयी-

" क्या खोया क्या पाया जग मैं,
मिलते और बिछड़ते पग में,

मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि चला गया पग पग में,

एक दृष्टि बीती पर डालें,
यादों की पोटली टटोलें,

अपने ही मन से कुछ बोलें,
अपने ही मन से कुछ बोलें।"

कविता की एक बहुत बड़ी विशेषता है, कवि और पाठक के बीच अनूठे तार बांध देती है, जैसे दोनों दिलों की धड़कने एक दिल में समा जाती हैं। जो दो व्यक्तियों की भावनाओं को एक कर दे वही कविता होती है।

मेरे लिए हर साल की पहली तारीख मनन करने का ही दिन होता है, शायद इस दिन को बनाया ही इसलिए गया होगा, ताकि क्या खोया और क्या पाया बस इन बातों को बटोर ले, और सम्पूर्णता की और बड़ें। बहुत पहले कुछ लिखा था मैंने --

"मानव  ने  जन्म  लिया ,
बचपन  की  चपलता ,
और  यौवन  की  उच्चश्रन्खला,
और  फिर  शांत  बुढ़ापा ,
फिर  जाते  जाते  मानव  ने  खुद  से  पूछा ,
"जिंदगी  सिखाती  है  , कितना  सीखा ?",
उत्तर  मिला - थोडा बहुत ,
और  पुनः  प्रारंभ  हुई
आदर्श  जीवन  के  लिए  यात्रा ...."

कर्म की परिनिष्पति ज्ञान के उदय से होती है, और ज्ञान का उदय शनै: शनै: होता है, अनवरत अभ्यास और गलतियों से सीख लेकर ही कोई परिपूर्ण होता है। यह दौड़ केवल एक आदर्श जीवन के लिए ही तो है। मैं भी सीख रहा हूँ और दौड़ रहा हूँ। तभी तो calendar  बदलना जरूरी है। आत्मविश्लेषण ही प्रयोजन है इस दिन का।