Monday, February 11, 2013


कुछ वीरानी सी है यह शाम,
आज शब्दों की कुछ कमी सी है,
रोज की तरह आज भी सूरज डूबते हुए लालिम ही था,
बदला कुछ भी नहीं,
पर कुछ भावनाएँ बदल चुकी हैं,
मेरी नहीं,,
तुम जानती हो किसकी,,
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वैसे तो तुम कभी थी भी नहीं मेरी,
किन्तु एक भाव था तुम्हें अपना माना था कभी,
लरज़िश भरे हाथों से कुछ बातों का पुलिंदा सौंपा था कभी,
आज उन बातों का कुछ अर्थ नहीं,
कुछ बातें बेवजह की थी,
आज उनका कुछ अर्थ नहीं,
तुम्हारे लिए,,,
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हसरतों के रास्ते भी बड़े एकाकी होते हैं,
कोई राज़ी नहीं होता साथ देने को,
साथ रह जाती हैं बस कुछ यादें,
वह भी बिछड़ जाएँगी,
कुछ रास्तों से कटती पगडंडियों की तरह,,,,
कुछ तुम्हारी तरह,
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कुछ भी तो नहीं है इस मकान में,
दरीचे और दरवाजों के सिवाय,

मेज पर बिखरी पड़ी किताबें,
अलमारी में बेतरतीब पड़े कपड़े,
दीवार पर बीते साल का कैलेंडर

तुम होती तो शायद सजाया होता करीने से,,,
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एक दिन मुरझाएगा,
मेरे बगीचे में लगा वो गुलाब का फूल,
उस पर मंडराता भंवरा भी,
रंजीदा हो चला जाएगा,
बस उस दिन के पहले,
तुम एक बार फिर मिलना,
.
एक आखिरी तोहफा,
तुम्हारे नाम से लिखे कुछ पन्ने,
'कुछ बातें अनकही,'
अब मेरे किसी काम की नहीं।
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