"एकाकीपन की बातें "
खिड़की के किनारे बैठ ,
वह सब कुछ सोच सकते जो हम चाहते हैं,
वह पल जो हमें ख़ुशी देते हैं,
वह बातें जिन्हें याद करके चेहरे पर मुस्कान आ जाए,
हम अपनी मर्जी से चुन सकते हैं वो चेहरे जिन्हें हम याद रखना चाहते हैं ,
उन चेहरों से जुडी यादें और बातें,
उन बातों को भी हम अपनी मर्जी से आने और जाने देते हैं,
सहसा ही मेज पर पड़ी खुली पड़ी एक डायरी के उड़ते हुए पन्ने,
खींच कर ले जाती है कुछ ऐसी यादों के घोंसलों में,
आँखों के सामने उड़ने लगे कुछ सूखे पत्ते,
जो उन घोंसलों को बनाते समय,
गिरे होंगे जमीं पर,
कितना अद्भुद होता है ये मन,
एक छोटी सी चीज से ना जाने कैसे जोड़ लेता है यादें।
समय कभी स्थिर नहीं रहता,
फिर कभी दोहराये नहीं जाएँगे वह पल,
जहाँ अचानक ही खींच ले गया मेरा मन,
अब कभी फिर से यह जगह नहीं होगी,
उदासी से घिर जाती है वही सुखद यादें,
जिन्हें खुद ही मैंने चुना था,
यही एकाकीपन काटने लगता है, जो कभी सुखद था,
सुखद और दुखद बातों में यही एक फर्क है
सुखद बातें मर्जी से आ या जा सकती हैं
लेकिन दुखद बातें जब आ जाती है वह हमारी मर्जी से नहीं जाती हैं।
कुछ बातें कभी हमारा साथ नहीं छोडती हैं,
हम संघर्ष करते हैं पर फिर भी हमें समेट लेती हैं कुछ बातें
जैसे सूखी मिटटी सोख लेती है पानी को।
समय तो चलता रहता है,
कुछ भी चिरस्थायी नहीं रहता,
शेष रहता है एकाकीपन, और उसकी बातें।
-दीपेश भावसार
bahut hii badhiyaa
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